कल बीत गया — बस बीत जाने दो

Sakshi Atman
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प्राचीन समय की बात है। एक संत थे — वियोगानंद। उनका जीवन एक सतत यात्रा था। वे कभी एक गाँव रुकते, कभी दूसरे। जहाँ भी जाते, लोग उन्हें घेर लेते। उनके पास बैठते, प्रश्न पूछते।

एक दिन, वे एक पुराने गाँव में पहुँचे। गाँव का नाम था संसृति, और वहाँ के लोग अजीब पीड़ा में थे। हर व्यक्ति किसी न किसी पुराने दुख को पकड़े बैठा था। कोई बचपन के अत्याचारों को रो रहा था, कोई अपने खोए हुए प्रेम को, कोई व्यापार में हुई हानि को। चेहरे मुरझाए हुए, आँखों में नमी।

वियोगानंद ने गाँववालों को एक वृक्ष के नीचे बुलाया। वृक्ष बहुत पुराना था — ठीक जैसे उन लोगों के दुख। उन्होंने मुस्कुराते हुए सबको देखा और कहा,

"आज मैं तुम सबको एक कहानी सुनाऊँगा। फिर तुमसे एक प्रश्न पूछूँगा।"

लोग चुप हो गए। एक गहन मौन फैल गया। वियोगानंद बोले:

"किसी समय की बात है — एक व्यक्ति था, जो हर दिन अपने कंधे पर एक भारी पत्थर लाद लेता था। वह चलता, ठोकर खाता, गिरता, फिर उठता। लोग उसे देखते और कहते, 'पगले, पत्थर फेंक दे!'
लेकिन वह सिर हिलाता और कहता, 'यह मेरा पत्थर है। मैंने इसे वर्षों से सँभाला है। इसने मुझे बनाया है। मैं इसे नहीं छोड़ सकता।'

समय बीतता गया। वह व्यक्ति बूढ़ा हो गया। उसकी कमर झुक गई, उसके पाँव काँपने लगे, लेकिन पत्थर जस का तस उसके कंधे पर था।
और फिर एक दिन, थककर वहीं गिर पड़ा — पत्थर समेत।"

वियोगानंद रुक गए। उनके शब्द जैसे हवा में गूँजने लगे। फिर उन्होंने पूछा:
"बताओ, उस व्यक्ति ने क्या खोया?"

एक बुजुर्ग ने धीमे से कहा, "उसने जीवन खो दिया।"

वियोगानंद हँसे, "हाँ! उसने वही खोया जो सबसे मूल्यवान था — जीवन। और क्यों? क्योंकि वह बीते हुए पत्थर को पकड़े रहा। वह जान ही न सका कि जीवन हर क्षण नया है।"

गाँव वालों की आँखों में हलचल होने लगी। कुछ के चेहरे पर पश्चाताप था, कुछ पर आश्चर्य।

फिर वियोगानंद ने अपनी बात को और गहरा करते हुए कहा,
"जो कल हो चुका, उससे सीखो। पत्थर को पहचानो — क्या उसमें कोई मूल्य है? यदि नहीं, तो उसे प्रेमपूर्वक रख दो।
बीते हुए से सीखो, लेकिन उसे अपने कंधे पर मत बाँधो।"

एक युवक उठा। उसकी आँखें लाल थीं। शायद हाल ही में किसी गहरे दुख से गुजरा था। उसने कहा,
"गुरुदेव, लेकिन कैसे? जो बीता, उसकी छाया तो मन पर बनी रहती है। भूलना आसान नहीं।"

वियोगानंद मुस्कुराए। वे प्रेम से बोले:

"बिलकुल आसान नहीं। और अगर तुम जबरदस्ती भूलने की कोशिश करोगे, तो और भी मुश्किल हो जायेगा।
भूलना कोई कार्य नहीं है।
केवल देखो — पूरी सजगता से देखो — कि जो बीत गया है, वह अब वास्तविक नहीं है।
वह केवल स्मृति है। और स्मृति में जीना, भूतकाल के भूतों के साथ जीने जैसा है।
स्मृति का प्रयोग करो सीखने के लिए — जैसे नदी पार करते समय तुम नाव का प्रयोग करते हो — लेकिन जब नदी पार हो जाए, तो नाव को सिर पर उठा कर जंगल में नहीं घुमते।"

गाँव के लोग ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। अब वे थोड़े हल्के महसूस कर रहे थे।

वियोगानंद ने एक और कथा सुनाई:

"एक राजा था। उसे हर हाल में खुश रहना था। उसने राज्य के सभी विद्वानों को बुलाया और कहा, 'मुझे ऐसा मंत्र दो जो दुःख में सहारा दे और सुख में संयम।'
विद्वानों ने महीनों मंत्रों पर विचार किया और अंत में एक वाक्य दिया:
'यह भी बीत जाएगा।'

राजा ने उस वाक्य को अंगूठी पर खुदवाया। जब राज्य में संकट आता, तो वह अंगूठी को देखता और मुस्कुराता — 'यह भी बीत जाएगा।'
और जब राज्य में अत्यधिक वैभव आता, तो वह फिर वही वाक्य देखता और सजग हो जाता — 'यह भी बीत जाएगा।'

समझो, जीवन का यही रहस्य है।"

गाँव वालों की आँखों में अब चमक थी। जैसे किसी ने जमी हुई धुंध को साफ कर दिया हो।

वियोगानंद ने सभा समाप्त करने से पहले गम्भीर स्वर में कहा:
"जहाँ से गुजर चुके हो, वहाँ से गुजर जाओ। उसे पकड़े मत रहो।
पकड़ने से सड़न होती है, बहने से जीवन होता है।
कल बीत चुका है — वह सपना था। चाहे अच्छा हो या बुरा, अब वह केवल धुँधली स्मृति है।
आज नया सूरज निकला है। उसे देखो, उसे जीयो।
अतीत को सजगता से विदा करो, ताकि वर्तमान को बाहें फैलाकर अपना सको।"

सभा समाप्त हुई। गाँव के लोग धीरे-धीरे उठे, लेकिन अब उनके कदमों में कुछ हल्कापन था।
कई लोगों ने उसी दिन अपने पुराने झगड़े समाप्त कर दिए। किसी ने वर्षों पुरानी शिकायतें छोड़ दीं। किसी ने अपने प्रियजन को माफ कर दिया।

गाँव में एक नई हवा बहने लगी थी।
जीवन फिर से मुस्कुराने लगा था।


अंतिम संदेश:

ओशो का यह वाक्य —
"जो कल हो चुका, उससे सीखें और पार जाएँ, दुहरायें मत ! जहाँ से गुजर गए वहां से गुजर ही जाएँ, उसको पकड़े मत रखें।"
— जीवन का महान सूत्र है।

मनुष्य दुख में नहीं जीता, वह स्मृति में जीता है।
जैसे कोई खाली हाथ भी, किसी अदृश्य भार को ढोता रहता है — वैसे ही।

अगर तुम सजग हो गए, अगर तुमने यह जान लिया कि जीवन सतत परिवर्तन है, एक सतत प्रवाह —
तो तुम भी पत्थर फेंक कर नृत्य कर सकोगे।
फिर हर क्षण नये रंग लाएगा, हर दिन नया आकाश बनेगा।

सिर्फ एक साहस चाहिए — छोड़ने का साहस।
कल को छोड़ो। अभी को जियो।

यही है मुक्ति। यही है ध्यान। यही है प्रेम।
और यही है जीवन।

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