एक पुरानी कथा है।
एक छोटा गाँव था, पहाड़ों के बीच छुपा हुआ। उस गाँव में एक साधु रहता था — शान्त, गंभीर और आत्मचिन्तक। उसे लोग ‘बाबा’ कहते थे। बाबा ने जीवन के रहस्यों को जाना था। वह न तो प्रवचन करता था, न ही किसी को उपदेश देता था। लेकिन फिर भी, जो उसके पास बैठते, उनके भीतर कुछ बदलने लगता।
गाँव के बाहर एक डाकू था। उसका नाम था कालिया।
कालिया आतंक का दूसरा नाम था। उसने न जाने कितनों के घर जलाए थे, न जाने कितनों को लूटा था। लोग उससे डरते थे। बच्चे उसके नाम से सहम जाते थे। लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जो किसी ने सोचा भी नहीं था।
कालिया को रात नींद नहीं आई।
उसने सोचा — "मैंने खूब लूटा, खूब मारा, खूब डर फैलाया। लेकिन मैं भीतर से खाली हूँ। मेरे भीतर एक अजीब सा दर्द है।"
उसकी आत्मा चुपके से उसे कचोटने लगी थी।
अगली सुबह वह बाबा के पास गया।
लोग भयभीत हो गए। सोचने लगे, "अब तो बाबा भी बचे नहीं!"
लेकिन बाबा चुपचाप बैठे रहे, जैसे कुछ घट ही नहीं रहा हो।
कालिया ने बाबा के चरणों में सिर रख दिया और कहा,
"बाबा! मैं बदलना चाहता हूँ। मैं अच्छा बनना चाहता हूँ। लेकिन मैं बहुत बुरा हूँ। मेरे भीतर बुराई का पहाड़ है। कृपा कर मुझे सिखाइए, मैं कैसे इस बुराई से लड़ूं?"
बाबा हँसे — वैसी हँसी जो फूलों के खिलने जैसी थी, जिसमें न कोई व्यंग्य था, न कोई उपहास; बस करुणा थी।
उन्होंने बड़े प्रेम से कहा,
"बेटा, बुराई से लड़कर कोई नहीं जीता। लड़ाई से तो बुराई और मजबूत हो जाती है। बुराई से मत लड़ो — उसके ऊपर उठो।"
कालिया चकित हो गया।
"ऊपर उठूँ? बाबा, इसका क्या अर्थ है?"
बाबा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और कहने लगे:
"देखो, अगर तुम अंधकार से लड़ना चाहो, तो लड़ोगे कैसे? क्या तुम लाठियाँ लेकर अंधेरे पर प्रहार कर सकते हो? जितनी तेज़ी से तुम लड़ोगे, उतना ही तुम थक जाओगे। लेकिन अंधेरा वहीं का वहीं रहेगा।
लेकिन अगर तुम एक दीपक जला दो, तो अंधकार बिना संघर्ष के स्वयं ही गायब हो जाएगा।"
"बुराई भी अंधकार की तरह है।
तुम्हारी लड़ाई बुराई को ताकत देती है, क्योंकि लड़ते समय तुम्हारा ध्यान बुराई पर होता है।
जहाँ ध्यान होता है, वहाँ ऊर्जा बहती है।
तुम जितना लड़ोगे, उतना ही बुराई को ऊर्जा दोगे।
उसके बजाय, अपनी ऊर्जा को अच्छाई में लगाओ।
प्रेम करो। करुणा पैदा करो।
सत्य की खोज करो।
जैसे ही तुम्हारा चित्त ऊपर उठेगा, बुराई ऐसे गिरेगी जैसे सूखा पत्ता टूटकर गिर जाता है।"
कालिया ने आँखे भर लीं।
उसने जीवन में पहली बार जाना कि अब तक वह गलत दिशा में दौड़ता रहा था।
कथा से आगे का प्रवाह
बाबा ने एक और कहानी सुनाई:
"बहुत पुरानी बात है। एक बार एक आदमी को स्वप्न आया। स्वप्न में वह एक बड़े सुंदर महल में गया। वहाँ दो दरवाजे थे — एक पर लिखा था 'स्वर्ग', दूसरे पर लिखा था 'बुराई से युद्ध'।
आदमी ने सोचा, 'बुराई से युद्ध करूँगा, फिर स्वर्ग जाऊँगा।'
वह बुराई से लड़ने वाले दरवाजे में घुस गया।
सालों तक वह बुराई से जूझता रहा। हर बुराई के पीछे एक नई बुराई जन्म लेती थी।
थक-हार कर एक दिन वह पीछे मुड़ा। तब उसने देखा — स्वर्ग का दरवाजा वहीं था, खुला हुआ।
वह हँसा और समझ गया —
स्वर्ग युद्ध में नहीं है, वह युद्ध से परे है।"
ओशो की दृष्टि में बुराई से ऊपर उठने का रहस्य
ओशो कहते हैं,
"अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि तुम हिंसा से लड़ो।
अहिंसा का अर्थ है — तुम प्रेम में इतने डूब जाओ कि हिंसा स्वयं ही खो जाए।
जैसे कोई स्वस्थ व्यक्ति बीमारी से लड़ता नहीं, वह स्वस्थ बना रहता है।
बीमारी अपने आप दूर हो जाती है।"
इसी तरह, बुराई का अस्तित्व तभी तक है जब तक तुम उसे महत्व देते हो।
तुम ध्यान करो।
अपने भीतर प्रकाश जगाओ।
जैसे-जैसे तुम्हारा चेतनत्व बढ़ेगा,
तुम देखोगे कि बुराई बिना किसी शोर-शराबे के मिटती जा रही है।
कालिया का नया जीवन
बाबा की बातों ने कालिया के भीतर एक नई आग जला दी थी — लेकिन यह आग प्रेम की थी, घृणा की नहीं।
उसने चोरी छोड़ दी।
उसने गाँव में एक कुआँ खुदवाया, ताकि गाँव वालों को पानी मिले।
उसने उन बच्चों के लिए एक पाठशाला बनवाई, जिनके माँ-बाप उसके हाथों उजड़ गए थे।
धीरे-धीरे लोग उसे "कालिया डाकू" नहीं, "भक्त कालिया" कहने लगे।
उसकी आँखों में एक ऐसी चमक आ गई थी जो केवल उन लोगों में होती है जो बुराई से नहीं लड़े — बल्कि उसके पार चले गए।
गहरा सन्देश
जीवन में अक्सर हम भी बुराइयों से लड़ते रहते हैं — अपनी आदतों से, अपने गुस्से से, अपने डर से।
हम सोचते हैं, "अगर मैं गुस्से से जीत गया, तो मैं शांत हो जाऊँगा।"
लेकिन असल में, गुस्से से लड़ने में ही हम गुस्से को नया जीवन दे रहे होते हैं।
ओशो कहते हैं,
"जो भी तुमसे कहा जाता है कि 'इसे छोड़ो', उसे छोड़ने की जरूरत नहीं।
बस अपने भीतर एक नई ऊर्जा पैदा करो।
और जैसे ही नयी ऊर्जा आती है, पुरानी चीजें स्वभाविक रूप से गिर जाती हैं।"
पुष्प खिलता है — तो काँटे भी पीछे छूट जाते हैं।
तुम्हें काँटों से लड़ने की जरूरत नहीं।
बस खिलना सीखो।
बस बढ़ना सीखो।
बस उड़ना सीखो।
समापन विचार
बुराई से लड़ना एक अंतहीन युद्ध है।
लेकिन बुराई से ऊपर उठना —
वह मुक्ति है, शांति है, प्रेम है।
जैसे नदी पत्थरों से नहीं लड़ती — वह बस बहती है।
पत्थर अपने आप पीछे छूट जाते हैं।
तुम भी जीवन में बहो।
ऊपर उठो।
और देखो — बुराई तुम्हारे पैरों के नीचे पड़ी है,
और तुम्हारे सिर पर आकाश है —
खुला, विशाल, अनंत!

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