कमजोर है वह साधुता, जो स्त्री को देखने या छूने से अपवित्र हो जाती हो। — ओशो
बहुत बरस पहले की बात है।
एक घना जंगल था। पेड़ों की कतारें, झरनों की कलकल, और दूर से आती पक्षियों की आवाजें — सब कुछ किसी दूसरे ही लोक का आभास देता था। उसी जंगल के बीचोंबीच एक छोटा सा आश्रम था, जहाँ कुछ साधु साधना करते थे। उन साधुओं में से एक था स्वामी अर्जुनानंद।
स्वामी अर्जुनानंद का तप सब जगह प्रसिद्ध था। कहते थे कि उन्होंने अपनी आँखें तक बंद कर ली थीं कि कहीं कोई मोह न फँसा ले। स्त्री को देखने भर से उनके भीतर भय उभर आता था कि कहीं साधुता न चली जाए, कहीं मन डोल न जाए।
एक दिन की बात है। वर्षा ऋतु का मौसम था। घनघोर बारिश हो रही थी। मिट्टी से सोंधी खुशबू उठ रही थी। उसी समय एक मुसाफिर युवती — भीगती हुई, काँपती हुई — उस जंगल में भटक गई। उसके कपड़े भीग कर शरीर से चिपक गए थे, और उसे ठंड से काँपते हुए देखकर कोई भी संवेदनशील हृदय द्रवित हो सकता था।
युवती ने आश्रम का द्वार खटखटाया।
भीतर से अर्जुनानंद का स्वर आया — "कौन है?"
"मैं... एक मुसाफिर... बारिश में भीग गई हूँ... शरण चाहिए," युवती ने काँपती आवाज़ में कहा।
अर्जुनानंद ने द्वार पर से ही उत्तर दिया, "यह साधु-संग है। यहाँ स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है। जाओ!"
युवती ने गिड़गिड़ाकर कहा, "स्वामीजी! बस एक रात! बारिश रुक जाए तो चली जाऊंगी।"
लेकिन अर्जुनानंद का हृदय कठोर था। उनके भीतर भय था — साधुता की रक्षा का भय।
उन्होंने दरवाजा नहीं खोला। युवती पूरी रात बारिश में काँपती रही। अगली सुबह जब सूरज निकला, तो आश्रम के बाहर एक निर्जीव देह पड़ी थी — वह युवती अब इस संसार में नहीं रही थी।
गांव वालों ने जब यह देखा, तो रोष में आ गए। वे अर्जुनानंद से पूछने आए — "क्या यही तुम्हारी साधुता है? एक जीवित प्राणी को, एक कांपती, मरती स्त्री को शरण न देना?"
अर्जुनानंद मौन थे। वे भीतर ही भीतर कांप रहे थे, परंतु बाहर से कठोर बने रहे। उन्होंने सोचा, 'मैंने तो अपनी साधुता बचा ली।'
लेकिन क्या सचमुच साधुता बची थी?
या वह कहीं बहुत भीतर मर गई थी, उसी क्षण जब उन्होंने करुणा को ठुकराया था?
यह वही क्षण था जब एक प्रबुद्ध पथिक — जिन्हें बाद में लोग "ओशो" के नाम से जानने लगे — वहां से गुजरे।
गांव वालों ने उन्हें बुलाया। सबने अपनी व्यथा कही। ओशो मुस्कुराए, उनके नेत्रों में करुणा थी।
ओशो ने अर्जुनानंद से पूछा,
"स्वामीजी, बताइए — क्या साधुता इतनी कमजोर होती है कि एक भीगी हुई स्त्री को देख भर लेने से गिर जाती है?"
स्वामीजी ने सिर झुकाया। कोई उत्तर न था।
ओशो बोले,
"कमजोर है वह साधुता, जो स्त्री को देखने या छूने से अपवित्र हो जाती हो।
वह साधुता तो छाया है — भय की, repression की, आत्मग्लानि की।
सच्ची साधुता तो फूल की तरह होती है — जिसे चाहे जो छुए, उसकी सुगंध बनी रहती है।"
"साधुता कोई दीवार नहीं कि स्त्री आए और ढह जाए। साधुता तो आकाश है — जहाँ से बादल आएं, जाएं, पर आकाश पर कोई दाग नहीं लगता।"
ओशो ने कहा,
"सुनो, अर्जुनानंद!
जिस साधना को बचाने के लिए तुम्हें करुणा छोड़नी पड़े, वह साधना नहीं, वह तुम्हारा अहंकार है।
अहंकार की रक्षा के लिए प्रेम को ठुकराना — यही असली अपवित्रता है।"
फिर उन्होंने गांव वालों की ओर मुड़कर कहा,
"स्त्री कोई पाप नहीं है। स्त्री भी उसी अस्तित्व की अभिव्यक्ति है, जैसी पुरुष है। अगर साधु पुरुष को देखकर अपनी साधुता नहीं खोता, तो स्त्री को देखकर क्यों कांप उठता है?"
यह भय कहां से आता है?
ओशो ने समझाया:
"यह भय आता है भीतर छिपे हुए दमन से। जो अपने भीतर कामनाओं को दबाता है, वही बाहर स्त्रियों से डरता है।
जैसे किसी कुंए में पानी जमा हो और ऊपर से ढक्कन लगा दिया जाए। ढक्कन मजबूत है, पर भीतर से पानी का दबाव बढ़ता जाता है। एक दिन ढक्कन फट जाएगा — और विस्फोट होगा।
साधुता ढक्कन नहीं है। साधुता तो वह आनंद है जो भीतर से छलकता है, बाहर तक फैलता है।"
ओशो ने वहां बैठे साधुओं को एक छोटी सी कहानी भी सुनाई:
"एक बार एक ज्ञानी साधु नदी के किनारे बैठा था।
तभी एक स्त्री नदी पार करने आई। वह घबराई हुई थी क्योंकि नदी का प्रवाह तेज था।
उसने साधु से मदद मांगी।
साधु ने बिना हिचकिचाए स्त्री को अपने कंधे पर बिठाया और नदी पार करवाई।
जब नदी पार हुई, तो साधु ने स्त्री को धीरे से नीचे उतारा और आगे बढ़ गया।
लेकिन उसके साथ के दूसरे साधु बहुत परेशान हो गए।
वे सोचते रहे — 'कैसा साधु है यह? स्त्री को कंधे पर उठाया!'
चलते चलते शाम हो गई, पर वे बेचैनी में थे।
आखिरकार उन्होंने पूछ ही लिया,
'स्वामी! आपने स्त्री को क्यों उठाया?'
साधु मुस्कुराया और बोला,
'मैंने तो उसे नदी पार उतरते ही नीचे रख दिया था,
पर तुम अब भी उसे अपने मन में उठाए हुए हो!'"
ओशो ने उस दिन कहा:
"सच्चा साधक स्त्री या पुरुष नहीं देखता — वह केवल जीवन देखता है।
उसके लिए एक बूढ़ा व्यक्ति हो या बच्चा, स्त्री हो या पुरुष — सब अस्तित्व के अंश हैं।
जहाँ भेदभाव है, वहाँ साधना नहीं हो सकती।
जहाँ भय है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता।
जहाँ दमन है, वहाँ मुक्ति नहीं हो सकती।"
आज भी जब हम इस वाक्य को सुनते हैं:
"कमजोर है वह साधुता, जो स्त्री को देखने या छूने से अपवित्र हो जाती हो।"
तो यह केवल साधुओं की बात नहीं रह जाती — यह हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी की भी बात है।
हम भी अपने भीतर डर पालते हैं।
हम भी कई बार दुनिया से बचने के नाम पर अपने हृदय को बंद कर लेते हैं।
लेकिन ओशो कहते हैं —
"डरो मत। जीवन को पूरी तरह जियो। स्त्री को देखो, पुरुष को देखो, फूलों को देखो, तारों को देखो — और आनंदित हो जाओ।"
जहाँ सरलता है, वहीं साधुता है।
जहाँ सहजता है, वहीं संतत्व है।
जहाँ प्रेम है, वहीं परमात्मा है।
अंत में, ओशो की एक और बात याद आती है:
"साधुता अगर बचाव है, तो वह बीमारी है।
अगर साधुता स्वाभाविकता है, सहजता है — तो वह सुंदरता है।"
तो आओ, जीवन को सहजता से जिएं।
स्त्री को देखकर आँखों में सम्मान आए, न भय।
छूने से अगर प्रेम बढ़े, करुणा बढ़े — तो जानो कि साधुता सच्ची है।
वरना...
जो साधुता कांपती है, गिरती है, डरती है — वह तो केवल दिखावा है।
और दिखावे से न स्वयं को बचाया जा सकता है, न जीवन को जाना जा सकता है।
~ ओशो की याद में, सहज जीवन की ओर एक कदम।

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